प्रिय देव,
जानते हो, मुझे तुम्हारी कौन-सी बात सम्मोहित करती है? तुम्हारी दीवानगी…
कि ठोस बर्फ पर चलता हुआ एक अनाड़ी बच्चा गिर कर उठता है,
उठते ही गिरता है,
फिर उठता, फिर गिरता है…
लेकिन थकता नहीं, हारता नहीं।
बल्कि नर्म मुलायम बर्फ को सँजोकर, कौतूहल से देखता है उसके कणों को।
किरणों के सामने कर उसे झिलमिलाता है,
मुँह में रखकर
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