A Newsletter Dedicated to Celebrating Consciousness
हमारे मूल संस्कार हैं :
अंधेरे और उजाले
*
घूंघट में रहता है
कृष्ण विवर ;
सारे उजालों को अनंत के विश्राम में रूपांतरित करता ब्लैकहोल।
वह निगलता नहीं है
हर हसरत से अजनबी होने का अवसर देता है
अनायास।
और तपना?
अंधकार में से आकर
रोशनी में टहलना क्षण भर
और अंधकार में तिरोहित
हो जाना।
रोशनी को अंधेरे के गर्भ से ही जन्म मिलते आए हैं
अगर ऐसी आँखें भी हों जो देखती हों
रौशनी तो अक्स
का रक्स भर है
बरअक्स।
और
प्रियतम है तम।
अंधेरा घूंघट है अ-प्रकाशित गर्भ का।
वो अन-उदघाटित बीज है :
मिट्टी में आने से पहले
‘तत् त्वम’ में छिपा हुआ ;
शून्य से सर्वस्व होने वाला रहस्य-रचनाकार।
सत्त्वों और तत्वों के पार…
सारी अस्ति और सारी नास्ति के सीमांतों के पर्यंतों से अछूता और हर हस्ती से बेख़बरदार
लेकिन
अमर्त्य में निराकार
अजन्मे में साकार।
बत्तियां अगर
देह के साथ ही नहीं बुझ जाएं
तो
सनातन याने अंधकार भूला हुआ परम स्वरूप है
अकिंचन होने की अघोषित डगर
मार्गमुक्त।
और
सातवें माले पर ही क्यों खिले कंवल?
त्रिनेत्र माथे पर ही क्यों धंसा रह जाए?
रोएं रोएं में रहता है जादू
और
अंगुली की ज़रा सी छुवन खोल देती है सारे द्वार
और
हर कहीं से पढ़ा जा सकता है मन…
किसी व्यक्ति या समूह का मन नहीं,
बस मन!
आंख की एक झपक से पहले पढ़ी जा सकती है
सारी परतों में पड़ी काया
और कयामतों में आती जाती
कायनात।
रोम रोम में रहती है अदृश्य अंगड़ाई
क्योंकि
पसीने के किसी भी मार्ग पर उसकी कलम लग जाती है
और
तीसरी आंख कहीं भी खुल सकती है
तीसवीं या असंख्यक होकर।
नवजात शिशु में
आंख खुलने से भी पहले
सन्नाटों में से चले आते हैं निराकार स्पर्श
और गुदगुदाने और खिलखिलाने का अर्थ इशारों तक में नहीं जानते
नवजात होना हर क्षण में संभव है
वरना दुनियावी जात की किसी पांत में लिथड़ जाएंगे जनम
और बुद्धों महावीरों की जातक कथाएं फिर अनछुई रह जाएंगी
आदमजात से।
जिस्म के जागरण बड़े तिलस्मी हैं
दुनिया ने सदियों से इतने दबाए ढके छिपाए हैं कि मर ही गए हैं
जन मन गण की बनाई रौशनियों से
बचना ही रचना है
रोशनी।
तुम्हारे प्रकाश-प्रदूषण से
निर्दोष कालिमा को
और हर काली मा को
नक़ाब में रहकर ही नया कुछ रचना है
अहंकार का अंधकार
लगातार अपनी सजावटी चकाचौंध के अशुभ के लिए
करता है बनावटी शुभ की दिखावटी कामना !
और पृथ्वी को प्रदूषित करता जाता है
सदा के मीत अंधकार की संतरी है
रौशनी :
चिरचेरी और सहचरी !
अमावसें मुझे उन पूर्णिमाओं में
नचाती हैं
जिनका उजाला भीतर की आँख ही देख सकती है
मेरे सयाने जब कहते हैं :
अंधकार से उजाले में जाओ
तो उनका इशारा तुम्हारी मुंडेरों पर
कुछ देर के लिए जलकर
मर जाने वाली चमक की तरफ कैसे हो सकता है?
उसका अर्थ यह होता है कि
अपनी कालिमाओं से बचने के लिए
भीतर रचो रौशनी
और अपनी चुंधियाई समझ को
दीक्षित करने के लिए
अन्धकार में
स्वीकार को साधो !
अंतत: उसी में निकलना है
एक भी मोमबत्ती के बग़ैर!
‘ज्योतिर्मा तमसोगमय’ जैसा कुछ है सफ़र।
चैन से सोना आ जाए
तो
बहुत सुकून देता है अन्धकार !
फिर किसी रौशनी से कोई डर नहीं लगता
हालांकि
तुम्हारे सारे कर्णधार
अपने सबसे बड़े अपराध
रौशनियों में करते हैं
सिर्फ शब्दों की सजावट से :
तुमसे सहयोग लेकर
और
फिर तुम्हारी जयजयकार पाकर !
अन्धकार न हो
तो कितना कठिन हो जाए
तुम लोगों से छिपना
धरती के अँधेरे में फूटती हर कोम्पल के लिए !
हालांकि
कायनात के पास
तुम्हारी रौशनियों के कबाड़ को
नष्ट करने के लिए
सदा से अनंत ब्लैकहोल हैं
बेशुमार डस्टबिन !
‘उस’ की रीसाइक्लिंग बेबूझ है !
उसके पास हर विकसित कोम्पल के लिए
अन्धकार के गर्भ में
सम्भावनाओं की कोमलताओं के लिए
अमर्त्य बीजों के
अनंत भण्डार हैं
जिन्हें तुम्हारी बनाई रौशनी
छू भी नहीं सकती
मगर तुम स्वयं को नष्ट करके भी
नष्ट नहीं कर सकते
इस कायनात का एक भी ज़र्रा !
जिन रेशों से बने हो
वो भी तो तुम्हारे नहीं हैं
तुम्हें जगना ही है
हज़ार बार सो-सोकर भी
बोना ही होगा नया बीज रो-रोकर भी !
०००
हाँ…
अपनी जोत जगाने को
अपने तम में डूबते जाना है उबरने की एक भी आहट पाए बग़ैर।
अन्धकार से आना और
और उसी में छिप जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है
होने में नहीं होने
और दोनों में अनहोने की सहजता है
रौशनी तो अक्स का रक्स भर है।
अन्धकार घूंघट है
सतत अ-प्रकाशित गर्भ है
अविस्फोट है
बीज का;
मिट्टी में छिपा रहस्य-रचनाकार…
प्रेम, सन्यास का माध्यम है
प्रेम, सन्यास का सबसे गहरा साथी है। प्रेम स्वयं को चाहने और पाने का एक तरीका है। यह बेहद निजी अनुभूति है। प्रेम किससे है, यह महत्वपूर्ण नहीं। तुम्हारा स्वभाव प्रेमयुक्त है तो तुम प्रेमी हो, फिर चाहे तुम्हे कोई प्रेम करे या नकरे।
प्रेम के वास्तविक अध्याय इतने अनोखे और निजी होते हैं कि सामने आने पर भी उन्हें न समझा जा सकता है, न लिखा जा सकता है। यह दुनिया अभी जैसी अधकचरी है, उसमें प्रेम अपना निर्मम संपादन करके ही दूसरों के सामने थोड़ा बहुत आने लायक बन पाता है। अंततः प्रेम अव्यक्त और खुफिया है। उसे पकड़ा नहीं जा सकता, सिर्फ जिया या समझा जा सकता है। सबसे बड़ा सच यह है कि प्रेमी अपने तमाम मिलन और सारे विरह देख लेने के बाद भी प्रेम को पूरा छू नहीं पाते। वह समूचा किसी के हाथ कभी नहीं आया। वह किसी का सगा नहीं है, सब में व्याप्त हो तो हो। प्रेम जिस परमाणु के मायावी बीज से बना है, उसके आगे सारे गॉड पार्टिकल भिखमंगे हैं। यह तड़प के विराट होते जाने की अकथ कहानी है। यह फना हो जाने के बाद की कविता है, जिसके अर्थ हर किसी के लिए जुदा-जुदा हैं। अपना अर्थ समझ में आए तो सब समझ में आ जाता है । पियो और जियो ! प्रेम गणित का प्रश्न नहीं कि हल हो जाए। इसका रहस्य ही इसकी अस्मिता, गरिमा और इसका आनंद है। अलबत्ता ‘मुहब्बत है क्या चीज, हमें भी बताओ’ गाते रहने में हर्ज नहीं है।
सन्यास का अर्थ संसार में रहते हुए सचेत रहना। यह बंधनों और जकड़नों से परे बोध की एक अवस्था है। सन्यास, प्रेम की अगली कड़ी है। प्रेम का संपूर्ण होना है, सन्यास। ज्यों-ज्यों प्रेम विस्तार पाता है, मोह पीछे छूटता जाता है। मोह का गिर जाना सन्यास है, इसलिए प्रेम और सन्यास साथ चलते हैं।
प्रेम हमें स्वयंब के भीतर ले जाता है। जैसे-जैसे गहराई में गोता लगाते हैं, एकात्म भाव महसूस होने लगता है। और सन्यास का फूल खिलने लगता है। सन्यास हमें हल्का बना देता है और ब्रहमाण्ड के एक कण की तरह हम निर्भार होकर संसार में तैरने लगते हैं । फिर हमें कोई पीढ़ा, कोई कल्पना, कोई संबंध या कोई प्रतिस्पर्धा, मान–सम्मान बांध नहीं पाता। इसीलिए सुगन्या ने कहा है कि–
“सन्यास का आसन बहुत आसान है – यह जगते में सो जाना ओर सोते में जग जाना है। यह मोक्ष का वह द्वार है, जहां से जब चाहो, किसी सुंदरतम व्यक्ति की देह में घुसकर पृथ्वीग्रह पर बिना टिकट सैर करने चले आओ! ऐस न भी चाहो तो भी ऐसा हो जाता है। मनमुक्त लोगों को अस्तित्व बड़े सुंदर अवसर देता है।