A Newsletter Dedicated to Celebrating Consciousness
जी नहीं! मैनेजमेंट गुरुओं, फिटनेस एक्सपर्ट्स, धार्मिक उपदेशकों, मोटिवेशनल स्पीकर्स की तरह कोई टिप्स नहीं दे रही हूँ।
ये सब विभिन्न माध्यमों पर ऑनलाइन और ऑफलाइन उपलब्ध हैं।
मैं आपसे बात कर रही हूँ आपकी खुद की।
आपको बदलने की नहीं बल्कि पहचानने की।
जी हाँ। केलैंडर वर्ष का बदलना महज समय को मापने की एक वस्तुनिष्ठ विधि है, ताकि दुनियावी काम-काज में समय का एक मापदण्ड निर्धारित हो सके। इसीलिए समय को दिनांकों, संख्यांकों, घंटों, मिनटों आदि में बाँटा गया है।
पूरा ब्रह्मांड स्वयं ही निरंतर बदल रहा है, उसका हिस्सा होने के नाते हम भी निरंतर बदल रहे हैं। मनुष्य होने के नाते हमारे पास एक अद्भुत चीज है- हमारी चेतना। यह मनुष्य का वह अमूर्त हिस्सा है जिसके कारण मनुष्य अन्य प्राणियों से अलग होता है। उसकी चेतना का स्तर सर्वोच्च है। यह हमारी नैचुरल विजडम है।
मन और बुद्धि के अति प्रयोग और हाइपरनेस के कारण हम अपनी चेतना को महसूस नहीं कर पाते हैं। हम नैचुरल विजडम की जगह केवल मन में उलझ जाते हैं। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा हमें नहीं मिल पाती, हम केवल शरीर और भोजन से मिली क्षणिक ऊर्जा का उपयोग कर पाते हैं।
चेतना के विकास के लिए जन्मों-जन्मों से जमी इन परतों को हटाना जरूरी है। शरीर की, मन की और बुद्धि की भी। सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों तरह की आदतों और संस्कारों से मुक्ति। हर तरह के विचार, धरना और पहचान से स्वतंत्रता। पूर्ण स्वतंत्रता। यह तभी संभव है, जब हम सजग हों। विषयों के प्रति, घटनाओं के प्रति, विचारों के प्रति, संस्कारों के प्रति, वातावरण के प्रति। हर क्षण हमारा सजग और बोधपूर्ण हो।
हम जिस समूह, समुदाय और समाज में रहते हैं उससे मिलने वाली शिक्षा, विचार, संस्कार हम पर आवरण की तरह छाये रहते हैं। हमारे सपने, लक्ष्य, जीवन शैली आदि सब आसपास के वातावरण से तय होती है। जिसे हम “चयन की स्वतंत्रता” या हमारी मर्जी कहते हैं, वह भी वस्तुतः सामाजिक ढाँचे द्वारा हमारे मन में अदृश्य रूप से इंजेक्ट किया हुआ एक भाव मात्र है। इस प्रकार हम सामूहिक और व्यक्तिगत बेहोशी के शिकार हो जाते हैं। कलेण्डर बदलते जाते हैं, शरीर बदलते जाते हैं, योनियां बदलती जाती हैं पर स्वभाव नहीं बदलता। जन्मों-जन्मों तक हम आदतों और संस्कारों की परतंत्रता में जकड़े रहते हैं।
शांति से बोध और सजगता आती है। यह शनेः शनेः सभी परतों को हटाती है, और हम अपनी चेतना से रूबरू हो पाते हैं।
हमारी नैचुरल विजडम हमारे जीने के तरीके को बिलकुल बदल देती है। यह घटना बहुत धीमे और शांति से घटती है। हमारे समय के अनुसार नहीं प्रकृति के समय के अनुसार।
अब हम समाज और समूह में रहकर भी अपनी स्वतंत्रता और चेतना को इंजॉय कर पाते हैं। सहज ही। अप्रयास।
हम वस्तुतः मनुष्य हो जाते हैं। ब्रह्माण्ड ऊर्जा हममें प्रवेश करती है और ओतप्रोत कर देती है। हमारी चेतना ब्रह्माण्ड की चेतना का हिस्सा हो जाती है। ऊर्जा का स्वभाव एक है। जैसे आत्मा-परमात्मा। फिर हम हुए ईश्वरमय। प्रकृतिमय।
E=MC²
आइये सजग बनें! चैतन्योत्सव में शामिल हों।
-श्वेता शर्मा (संपादक)