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A Newsletter Dedicated to Celebrating Consciousness

सौन्दर्य तो झर जाने में है...

प्रिय देव,
जानते हो, मुझे तुम्हारी कौन-सी बात सम्मोहित करती है? तुम्हारी दीवानगी…
कि ठोस बर्फ पर चलता हुआ एक अनाड़ी बच्चा गिर कर उठता है,
उठते ही गिरता है,
फिर उठता, फिर गिरता है…
लेकिन थकता नहीं, हारता नहीं।
बल्कि नर्म मुलायम बर्फ को सँजोकर, कौतूहल से देखता है उसके कणों को।
किरणों के सामने कर उसे झिलमिलाता है,
मुँह में रखकर
उसका स्वाद महसूस करता है,
…पिघलती हुई बर्फ में ज़िंदगी तलाशता है।

सुनो देव,
यूं ही बच्चे बने रहना!
कभी थकना मत… हार भी मत मानना।
चाहे जितनी मोटी बर्फ की तहें जमी हों तुम्हारे रास्ते में!
सोच रहे होंगे कि इन उमस भरे दिनों में बर्फ की याद क्यों आ गई…
अभी-अभी लौटी हूँ न बर्फीले प्रदेश से।
वो यादें और एहसास अभी वैसे ही जीवंत हैं, जैसे कि वर्तमान!
और हाँ…
प्रेम की कली को फूल बनने से कभी मत रोकना,
कभी मत टोकना…
कच्ची कली की सार्थकता तभी तक है,
जब तक कि वो शाख पर है।
यदि उसकी हरियाली छिन गई, तो फिर वो किताबों में रह जाएगी,
हर्बेरियम  बनकर!

प्रेम का भाव शाश्वत है, देव…
पूरी तरह खिल उठना ही जीवन को मायने देता है।
और तब भी हमें प्रीत के उस पवित्र स्वरूप को तोड़ने का हक नहीं!
उसका सौंदर्य तो झर जाने में है।

कभी ऐसा गुलाब देखा है?
जो पूरी तरह खिलकर आधा झर गया हो
और जिसकी आधी पंखुड़ियाँ बच रही हों…
अगले दिन झरने के इंतजार में!
वो गुलाब ही तो है प्यार की पराकाष्ठा!
हम भी पहुँच सकते हैं उस पराकाष्ठा तक…
बस वो विश्वास बना रहे,
अपने पिया की आस का…
अपनी प्रीत की प्यास का!

-तुम्हारी मैं!